नोटबंदी के बाद युवाओं का है बुरा हाल, नौकरी के लिए दर-दर भटकने को हुए मोहताज़

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साल 2016 से 2018 के बीच देश के करीब 50 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं. साल 2016 वो ही साल जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने देश में नोटबंदी का ऐलान किया था और 1000-500 के नोट बंद कर दिए थे. अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (बेंगलुरू) की ओर से जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार साल 2016 से 2018 के बीच 50 लाख लोगों ने नौकरी गंवाई है.रिपोर्ट के अनुसार, साल 2016 की तीसरी तिमाही यानी सितंबर 2016 से दिसंबर 2016 के बीच शहरी और ग्रामीण लोगों की लेबर पार्टिशिपेशन फोर्स में भागीदारी अचानक कम होने लगी. इसका मतलब है कि सितंबर 2016 नौकरियों में कमी आने लगी. वहीं 2017 की दूसरी तिमाही में इसकी दर में थोड़ी कम आई, लेकिन बाद में नौकरियों की संख्या लगातार कम होती गई, जिसमें कोई सुधार नहीं हुआ.  

बता दें कि नौकरियों में गिरावट की शुरुआत का समय नोटबंदी के वक्त ही शुरू होता है. अगर तीन सालों की बात करें तो जनवरी-अप्रैल 2016 से सितंबर-दिसंबर 2018 तक, शहरी पुरुष एलएफपीआर की दर 5.8 फीसदी जबकि उसी आयु समूह में डब्ल्यूपीआर की दर 2.8 तक गिर गई है. साथ ही नोटबंदी से भविष्य में भी नौकरी का संकट होने की बात कही गई है और अभी रिपोर्ट का दावा है कि अब तक नोटबंदी के बाद बने हालात सुधरे नहीं है. वहीं रिपोर्ट में कहा गया है कि 20-24 आयु वर्ग में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है और नोटबंदी से पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा प्रभावित हुई हैं.

साल 2016 और 2018 के बीच भारत में काम करने वाले पुरुषों की आबादी में 16.1 मिलियन की वृद्धि हुई. वहीं इसके उलट इस अवधि के दौरान डब्ल्यूपीआर की मात्रा में 5 मिलियन नौकरियों का नुकसान हुआ है. बता दें कि अभी तक इस रिपोर्ट में पुरुषों के आंकड़ों को ही शामिल किया गया है. बता दें कि श्रम बल भागीदारी दर को एलएफपीआर कहा जाता है. अगर इसमें महिला कर्मचारियों के आंकड़े शामिल किए जाते हैं तो इस संख्या में और भी इजाफा हो सकता है.

हालांकि लोकसभा चुनाव के दौरान यह रिपोर्ट सामने आने से विरोधी पार्टियों को सरकार पर हमला बोलने का एक और मौका मिलेगा. दरअसल विरोधी पार्टियां लंबे वक्त से रोजगार के मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश की गई है.

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